वर्तमान में लोकसभा में 545 सदस्य हैं । इनमें से 530 सदस्य राज्यों से , 13 सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों से और 2 सदस्य एंग्लो-इंडियन समुदाय के राष्ट्रपति द्वारा नामित या नाम निर्देशित किए गए है ।
Saturday, 30 May 2020
लोकसभा की संरचना
लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 निर्धारित की गई है । इसमें से 530 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 20 सदस्य संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं और 2 सदस्य एंग्लो-इंडियन समुदाय के राष्ट्रपति द्वारा नामित या नाम निर्देशित किए जाते हैं।
राज्य सभा की संरचना
राज्य सभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित की गई है । इनमें से 238 सदस्य राज्यों व संघ राज्यों क्षेत्रों के प्रतिनिधि (अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित ) होंगे , जबकि 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाएंगे ।
वर्तमान में राज्य सभा में 245 सदस्य है । इनमें 229 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं । 4 संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं ।
संविधान की चौथी अनुसूची में राज्य सभा के लिए राज्यों व संघ राज्य क्षेेत्रों में सीटों के बंटवारे का वर्णन किया गया है ।
संसद -
संसद केन्द्र सरकार का एक महत्वपूर्ण अंग है । संसदीय प्रणाली को सरकार का वेस्टमिंस्टर मॉडल भी कहा जाता है । संसदीय प्रणाली को अपनाने के कारण भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संसद विशिष्ट और केन्द्रीय भूमिका रखती है ।
संविधान के पांचवें भाग के अंतर्गत अनुo 79 से 122 में संसद के गठन , संंरचना , अवधि , अधिकारियों , कार्य , विशेषाधिकार व शक्ति के बारे में वर्णन किया गया है ।
संविधान के अनुसार भारत की संसद के तीन अंंग है - राष्ट्रपति , लोकसभा व राज्य सभा ।
1954 में राज्य परिषद एवं जनता का सदन के स्थान पर राज्य सभा तथा लोकसभा शब्द को अपनाया गया ।
राज्य सभा को (उच्च सदन ) तथा लोकसभा को (निम्न सदन ) कहा जाता है ।
नोट - राज्य सभा को दूसरा चैंबर या बड़ों की सभा भी कहा जाता है ।
तथा लोकसभा को पहला चैंबर या चर्चित सभा भी कहा जाता है ।
Thursday, 28 May 2020
1784 का पिट्स इंडिया एक्ट -
रेग्यूलेटिंग एक्ट , 1773 की कमियों को दूर करने के लिए ब्रिटिश संसद ने एक संशोधित अधिनियम 1781 में पारित किया , जिसे एक्ट ऑफ सैटलमेंट के नाम से भी जाना जाता है । इसके बाद एक अन्य महत्वपूर्ण अधिनियम पिट्स इंडिया एक्ट , 1784 में अस्तित्व में आया ।
अधिनियम की विशेषताएं-
1 - इसने कंपनी के राजनैतिक और व्यापारिक कार्यों को अलग - अलग कर दिया ।
2 - इसने निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षक की अनुमति तो दे दी लेकिन राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल ) नाम से एक नया निकाय बनाया गया । इस प्रकार द्वैध शासन व्यवस्था का शुभारंभ किया गया।
3 - नियंत्रण बोर्ड को यह शक्ति थी कि वह ब्रिटिश नियंत्रण भारत में सभी नागरिक , सैन्य सरकार व राजस्व गतिविधियों का अधीक्षक एवं नियंत्रण करें ।
इस प्रकार , यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था -
1 - भारत में कंपनी के अधीन क्षेत्र को पहली बार " ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र " कहा गया ।
2 - ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के कार्यों और प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया ।
Monday, 25 May 2020
1773 रेग्यूलेटिंग एक्ट
1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट
इस एक्ट तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने और भारतीय जनता से उपहार व रिश्र्वत लेना प्रतिबंधित कर दिया ।
इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश सरकार का " कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स " के माध्यम से कंपनी पर नियंत्रण मजबूत हो गया ।
1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट
1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट -
इस अधिनियम का अत्यधिक संवैधानिक महत्व है , क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा उठाया गया यह पहला कदम था , इसके द्वारा पहली बार कंपनी के प्रशासनिक और राजनैतिक कार्यों को मान्यता मिली , भारत में केन्द्रीय प्रशासन की नींव रखी गई ।
अधिनियम की विशेषताएं -
1 - इस अधिनियम द्वारा बंगाल के गवर्नर को " गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल " नाम दिया गया और उनकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया ।
Imp - बंगाल के पहले गवर्नर लार्ड वारेन हेस्टिंग्स थे ।
2 - इस अधिनियम द्वारा मद्रास (वर्तमान चन्न्ई) एवं बंम्बई के गवर्नर , बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गए , जबकि पहले सभी प्रेसिडेंसियों के गवर्नर एक - दूसरे से अलग थे ।
3 - अधिनियम के अंतर्गत कलकत्ता में 1774 में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई , जिसमें मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे ।
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